आओ, सच को अपना स्वर दें । मानस को प्रदूषित कर रहा.., यह असहमत मौन !
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06 March, 2008

एक निःशब्द क्रंदन बतर्ज़.. चल उड़ जा रे पंछी

बहुत ज़द्दोज़हद के बाद यह तय पाया गया कि , अब यहाँ से चलना चाहिये । मेरी एक मनपसंद कविता है, " कोशिश करने वालों की हार नहीं होती .. " जब यहाँ पेज़ लेआउट, एलिमेंट एवं सेटिंग, संपादन वगैरह में दख़ल ही ना रहा तो ज़ाहिर है कि  यह देश हुआ बेगाना......चल उड़ जा रे पंछी ऽ

चल उड़ जा रे पंछी - कुछ तो है... जो कि ! 

वस्तुतः पंछी मुझे बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, अपने छत पर कहीं छाँव में चारपाई डाल कर उनको खुले आसमान में स्वछंद उड़ते देखने का सुख अवर्णनीय है । हर चिंता फ़िक्र को अपने डैनों से झाड़ते हुये निरद्धंद विचर रहे होते यह पखेरू पता नहीं किस अनारकली का संदेश इधर से उधर कर रहे होते हैं । ऊपर आकाश से नीचे की ज़मीनी हक़ीक़त पर एक विहंगम दृष्टि फेरते हुये, जैसे हम धरती वालों पर मनमर्ज़ी बीट करने को सर्वथा स्वतंत्र , ये पाखी !

चलो फिर से नीड़ बनायें-कुछ तो है इनमें

भला सोचिये आँधी तूफ़ान से उजड़ा इनका बसेरा इनको तनिक भी अवसाद नहीं देता । थोड़ी देर की चमगोईंयाँ, बस ! फिर मौसम खुलते ही अविचल अपने नीड़ का निर्माण फिर से करने में जुट जाना कितना प्रेरणादायक है । चूज़ों को मर खप कर चुगाना और फिर उन्हें अपनी आज़ाद ज़िन्दगी जीने को छोड़ देना, न कि उनसे अपने खिलाये पिलाये का हिसाब माँगना, जैसे वही हम मनुष्यों से ऊपर हों

 

आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास ! मैं तो यहाँ केवल सूचना देने आया था और फ़लसफ़े में डूब गया । यह कुछ तो है ... में जो कुछ भी देखने पढ़ने योग्य हो,  वह अब अपने नये पते पर दिखेगा । अब तक की पिछली पोस्ट हस्बे मामूल यहीं पर दिखा करेंगे ।

यहाँ से एक्सपोर्ट- इम्पोर्ट करना मेरे बस का नहीं है, सो..

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कुछ तो है... जो कि ! *द्वितीय आवृति यहाँ देखें   <<क्लिक करें

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निःसंदेह, आपलोगों ने आशा से अधिक प्रोत्साहन दिया । किंतु एक शिकायत है, केवल प्रोत्साहन ही मिला, आलोचना को अब तक तरसता ही रहा । एक स्वस्थ विकास के लिये आलोचना का होना बहुत आवश्यक है । हिंदी ब्लागिंग में लेखकों की भरती तो बेतहाशा हो रही है , किंतु एक दो अदद आलोचक भी हों तभी यह कुनबा पूरा होगा । शायद बिना कुछ लिये दिये आलोचना करना कोई गवारा न करे, किंतु रहीमदास जी का सबको वास्ता है कि कुछेक निंदक नियरे बहाल किये जायें । कुछेक बरतन खड़कने की  आवाज़ें भी यदा कदा आती रहीं किंतु यह अपरिहार्य है, जहाँ जीवंत मनुष्य होंगे, बरतन भाँड़े भी वहीं ढनमनायेंगे । इससे एकरसता तो दूर होती ही है  और यह संतोष है कि कम से कम खंड़हर का सन्नाटा तो नहीं है, अपने ब्लागजगत में ! लोग एक दूसरे को जानते समझते भी  हैं

अच्छा तो फिर मिलेंगे .... वहीं ..ऽ ..ऽ, जहाँ कोई आता जाता नहीं । तो, हम चलते हैं, नमस्कार !

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पिछली पोस्ट ' एक निःशब्द क्रंदन ' पर ढेर सारे निःशब्द टिप्पणियों के लिये कोटिशः धन्यवाद ।  यह एक शुभ संकेत है कि अपना हिंदी ब्लागजगत अब महानगरी में परिवर्तित होता जा रहा है ।  सब अपने काम से काम भले रख रहे हों, किंतु यहाँ का स्टेटकाउंटर इन निःशब्द टिप्पणियों की गवाही दे रहा है । शब्द तो निःशब्द में भी बसा रहेगा , अंतरिक्ष में टँगे ग्रह नक्षत्रों की तरह !

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29 February, 2008

एक निःशब्द क्रंदन

किसी का पाला पोसा किशोर मानसपुत्र अपहृत हो जाये , और वह क्रंदन भी न करे तो उससे महान योगी भला मेरी निगाह में कोई और हो ही नहीं सकता । अफ़सोस कि यह मैं नहीं हूँ, और न ही बनना चाहता हूँ । मैं मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं के साथ हँसते रोते हुये जीना चाहता हूँ , अतएव गुरुवर श्रीमान ज्ञानद्त्त जी से निवेदन है कि मुझे कम से कम इस बेला एक निःशब्द लघुक्रंदन की अनुमति तो प्रदान ही कर दें । मान्यता है कि इससे मन हल्का होता है । सो, ऎसा हो लेने दीजिये । अरे जो भी कद्र्दान हैं, मुझसे एक बार माँग ही लेते, मैं ' कुछ तो है...' तो क्या, अपना जो कुछ भी दरकिनार कर सबकुछ ही दे देता । झटके हुए गुड़ की मिठास कहीं उनको पंकज अवधिया जी से ज़ादुई गिलास लेने रायपुर न पहुँचा दे । हे ईश्वर, इन्हें क्षमा कर, ये नहीं जानते कि इन्होंने किया क्या है ? इन सब घटनाक्रम से मेरी बेबाकी कुछ बढ़ ही जायेगी । ब्लागिंग से मेरा इश्क़ परवान चढ़ ही रहा था कि यह सब अचानक हो गया । ढाढस बँधाने को फ़क़त मिर्ज़ा ग़ालिब ही अपनी कब्र से निकल मेरी बेचैन रातों को सहलाते हुये यह लाइन गुनगुना कर, मेरे बिसूरते मन को समझाते हैं.....

रोने से और..ऽ इश्क़ में बेबाक हो गये, धोये गये हम ऎसे कि..ऽ बस पाक हो गये !

और मित्रों दिन में रहीम साहब कानों में गूँजते हैं

पावस देखि ' रहीम ' मन

कोयल साधे मौन

अब दादुर वक्ता भये

हमको पूछत कौन

फिर भी जब तक लाइव राइटर से बन पड़ रहा है, यहाँ मौज़ूद रहूँगा, दूसरे ठिकाने की तलाश में अब चलता हूँ,

शुभ रात्रि !

एक पोस्ट , अनमनी सी

मेरा एक प्रिय गीत हुआ करता है, " दिल ढूँढ़ता है फिर  कभी फ़ुरसत के रात दिन चार पल "   आज वह दो चार पल हासिल भी हुये तो सोचा कुछ ब्लागियाया जाय । बहुत से विषय और संदर्भ मन में घुमड़ रहे हैं, यह ' ये डाक्टर...' श्रृंखला भी अधूरी सी छूटी जा रही है । चलो आज फ़ाइनल हो जाय ।

आपको यह जान कर ताज्जुब होगा कि मेरा यह सड़िल्ला ' कुछ तो है.... ' चोरी हो गया है । मैं तो अब तक एक-एक टिप्पणी किसी तरह सहेजता रहा और यहाँ किसी भाई ने पूरी की पूरी ब्लगिया ही बटोर कर अपनी ज़ेब के हवाले  कर लिया । जी हाँ , मेरा स्वामित्व बोले तो मालिकाना हक़ किसी कद्रदान ने हड़प लिया यानि Administrative Rights छिन गये । यह आप पिछली पोस्ट को देख कर अंदाज़ लें कि मैंने लाइव राइटर की मदद से पोस्ट तो ठेल दी किंतु जब आई०एम०ए० प्रेयर की शक्ल ओ' सूरत सुधारने की चेष्टा की तो ब्लागर चच्चा बाँह पकड़ लिये, सेटिंग में गये तो वहाँ  गूगल बाबा की नोटिस दिखी 

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चोरी किया रेमेरा वो सामान लौटा दो

तब से उधेड़बुन चल रही थी कि क्या करें, ऎसा क्यों हुआ । अपने कंम्प्युटर ज्ञानकोष का एक एक ब्रहमास्त्र भाँज कर भी कोई उपाय नहीं दिखा । " किसी से पूछ लो " यह पंडिताइन की राय बनी ।   वरिष्ठ जनों से मदद की गुहार की तो पता चला ब्लगिया तो चोरी हो गया है, अब बैठे गाते रहो, " मेरा कुछ सामान.... तुम्हारे ..ऽ ..ऽ पास पड़ा है... मेरा वो सामान मुझे..ऽ  ..ऽ लौटा दो,     मेरा ब्लाग मुझे ..ऽ लौटा दो " । यह अलग बात है कि पंडिताइन अपने विशिष्ट (VIP) होने के भाव के संग कुछ इतराती हुई सी पूरा वाक़या सबको बता रहीं हैं । किसी तक़लीफ़ या दुर्घटना के लाईमलाइट में आने का सुख भला क्यों छोड़ें ? ब्लागिंग को फ़ालतू टाइमवेस्ट समझने वाले सज्जन जरा जान तो लें कि यह भी चोरी होने योग्य महत्व रखता है । मेरे मित्र अज़हर भाई लपक कर इंटरनेट पर देख आये, एक उपलब्धि मिली हो ऎसे लहक कर बोले, ' यार, अच्छा भला वहीं तो है, साले तुम भी बहुत बड़े रागिया हो , तबसे फ़ालतू हलाक़ान कर रखा है । '  उन्हें अब क्या बोलूँ ?

Chithakar@googlegroups.com,
sagar chand nahar <sagarchand.nahar@gmail.com>,
raviratlami@yahoo.com,
date  23 Feb 2008 18:18  
subject  [Chitthakar] Re: कृपया सहायता करें  
signed-by  googlegroups.com  
mailed-by  googlegroups.com  

डॉ साहब
मेरे हिसाब से  ऐसा एक ही परिस्थिती में  होता है जब आप किसी और को ब्लॉग का सदस्य बना कर पूरे अधिकार दें और वह आपको  हटा कर खुद मालिक बन जाये। ( हो सकता है अन्जाने में हुआ हो)
क्या आपने किसी को सदस्य बनने का आमंत्रण दिया था? अगर हाँ तो उस मित्र को कहें कि  Dash Board- Setting- Permission  में आपके नाम के आगे Grant admin privileges  लिखा होगा उस पर क्लिक करें जिससे आपको पुन:  layout दिखने लगेगा।
Revoke admin privileges  पर क्लिक कर देने से  ब्लॉग मे आप पोस्ट तो लिख सकते हैं पर ब्लॉग के lay out  में आप किसी भी तरह के परिवर्तन करने का अधिकार उस सदस्य का खत्म हो जाता है।
शायद आपकी समस्या इससे हल हो जायेगी। और कोई तरीका होगा तो रविभाई साहब एवं वरिष्ठ मित्र बतायेंगे।
धन्यवाद

हालाँकि 'कुछ तो है ....' को फिलहाल ' फुस्स तो है...' नहीं होने दूँगा । यदि सर्वसम्मति हो तो इसको अपने रामलला की तरह कहीं और स्थापित कर दूँ और लिंक यहाँ दे दूँ । क्या कहते हैं ?   या तथाकथित मित्र महोदय की कृपादृष्टि होने तक प्रतिक्षा करूँ, शायद वह मेरा सामान लौटा ही दें। लेकिन इसकी संभावना कम ही लगती है ,क्योंकि फ़ुरसतिया गुरु भी डंडा लिये अपनी गिल्ली की तलाश में 13 फरवरी की पोस्ट में देखे गये हैं ( मैं ब्लागर क्यों बना ? ) एक ज़ायज़ा भर लेलें

कल देखा तो मेरे ब्लाग की दो पोस्टें नदारद हैं। तमाम लोगों ने उन पोस्टों के लिंक देकर कई पोस्टें लिखीं है।
आधार पोस्ट गायब है। मैंने मिटाई नहीं, क्या लफ़ड़ा हुआ। स्वामीजी के अनुसार तो इसके पीछे होस्टिंग कम्पनी का हाथ है-
मुझे लगता है इसका श्रेय हमारी साईट की होस्टिंग कंपनी को जाता है - हाल ही में उनकी मेल आई थी की वे हमारी साईट को बेहतर सर्वर पर डाल रहे हैं -
लगता है की उन्होंने पुराने डाटाबेस की रिकवरी कर दी और आपका ताजा माल हवा हो गया, मैने उन्हें मेल भेजी है!
क्या कहीं से ये पोस्टें मिल सकती हैं! अगर किसी साथी के पास हों तो कृपया मुझे भेज दें ताकि मैं उनको दुबारा पोस्ट कर सकूं।
एक का शीर्षक है ज्ञानजी को कायदे मौज लेना नहीं आता। दूसरी का है-...............फ़ूल खिला एक दिख जाता है।

इस पोस्ट की दसवीं भी नहीं हो पायी थी कि 23 फरवरी को ज्ञानू गुरु ने रिटायरमेंट लेने की भूमिका बनानी शुरु कर दी । बड़ा अज़ीब और उखड़ा उखड़ा सा माहौल हो रहा है, इस समय अपनी बिरादरी में ! जब उड़न तश्तरी ही हाईजैक हो गयी हो तो भला मेरी क्या बिसात ? समीर लाल जी रिरिया रहे हैं, उनका ब्लाग आई०डी० चोरी हो गया है ! किस थाने में इन चोरियों की रपट दर्ज़ करवायी जाये, बिरादरी में कोई पंचायत होगी भी तो पाँच पंच ; पाँच मत ही चरितार्थ होगा ।

25 February, 2008

ये डाक्टर .. .. ..ये कैसे डाक्टर ?

 

क्रम - छः *  टीसते हृदय से सबका आभार

यह एक डाक्टर की सबसे बड़ी त्रासदी ही है उसका सम्पूर्ण कैरियर तनाव एवं आक्षेपों से आप्लावित रहता है । सामान्य जन उसको रहस्यमय शक्तियों से लैस मसीहा भले मानते हों , किंतु उसे अपनी तमाम व्यवसायिक अक्षमताओं एवं व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावज़ूद भी इस करिश्माई मिथ को जीवित रखना पड़ता है , Larger than Life !

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः                                                                              सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्                                                                             न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गः न पुनर्भवम                                                                          कामये दुःख तप्तानां, प्राणिनामार्तनाशनम                                                                                May Everybody be happy                                                                                                                         May Everyone be free from illness                                                                                                            May All of us see to it                                                                                                                            That nobody suffers from pain or sorrow                                                                                                        I do not ask for a Crown                                                                                                                          Nor I wish to be in heaven or reborn                                                                                                             I only want to alleviate the sufferings of those,                                                                                            Who are burning in the fire of sorrow 

जिस  इतरकल्पना और सुखबोध के फ़ंतासी से अभिभूत हो कर इस प्रार्थना की रचना की गयी होगी, वह आप भी आँक लें । इसमें निहित आध्यात्म का शतांश एक अदना बाल बच्चेदार डाक्टर ( MBBS बोले तो मियाँ बीबी बच्चों समेत ) तो क्या, कोई पहुँचा फ़कीर भी अपने में उतार ले तो वास्तव में प्राणिनामार्तनाशनम हो जाये, संसार में कोई दुखी ही न दिखे। खेद है कि यह फंतासी इस भौतिकवाद के युग में नितांत यूटोपिक ( n. Utopia ) गान में रूप में ही खप सकता है , व्यवहारिक जीवन में तो कतई नहीं ! वरना दाल रोटी के लिये हड़तालें  एक कल्पना का विषय होतीं। वास्तविक आभार की अधिकारिणी ममता जी हैं, जिन्होंने शायद AIIMS में चल रही हड़ताल से क्षुब्ध हो कर एक पोस्ट लिखी ( ये कैसे डाक्टर ? mamta t.v. 5 दिसंबर 2007 ). यह दीगर बात है कि मैनें अपने में डाक्टर होने का ईगो पनपने ही नहीं दिया, डाक्टर होने को मैं केवल अपनी गरिमा की रक्षा तक ही बाँध कर रखने का हिमायती हूँ। फिर भी.... थोड़ी तिलमिलाहट हुई क्योंकि इस पोस्ट में केवल इस व्यवसाय और इससे जुड़े व्यवसायिक पहलू के नकारात्मक पक्ष को ही शब्दों में पिरोया गया था । लिहाज़ा इस ओर सोचने पर बाध्य हो तात्कालिक प्रतिक्रिया में एक तल्ख़ टिप्पणी ठोक दी, जिसको उन्होंने बड़ी ईमानदारी से बिना काट छाँट के प्रकाशित होने दिया । पर बात ख़त्म नहीं हुई थी क्योंकि मेरा असहमत मौन मुझे बार बार कोंच रहा था, ' कुछ करो यार ! '

कड़वा आभारimage0144

भला ऎसे क्या किया ही जा सकता था, पब्लिक के नज़रिये से उन्होंने एक एक शब्द सही लिखा है । सो, मेरा काम कुछ बढ़ गया, और अपने ग़िरेबाँ में झाँकते न झाँकते थमके साँस ली तो एक मिनि शोधप्रबंध तैयार हो चुका था । आख़िर इसे कौन पढ़ेगा ? वैसे ही मेरे स्टैटकाउंटर पर कोई गवर्नर लगा हुआ है, जैसे कि कारबुरेटर वाली नयी गाड़ियों में होता है । यह सब ठेलोगे तो रहे सहे पाठकों से हाथ धो बैठोगे ! रिस्क लेने में क्या हर्ज़ है ? बस ऎसा करो कि आँकड़े निकाल दो तो कुछ सुपाच्य हो जायेगा, मेरी विदुषी पंडिताइन का सुझाव था। पहले यही धिक्कार रहीं थीं, बेचारी औरत से उलझोगे, जाने भी दो । एक औरत दूसरी को बेचारियों में क्यों शुमार कर लेती है, यह तो चोखेर बाली से पता लगेगा , वह सब बाद में ! लिहाज़ा आँकड़े निकाल दिये,वैसे भी आँकड़े वाँकड़े गौरमिन्ट की खुराक है ! फिर भी मैटर न संभला,सो किश्तों में बाँट दिया । हिप्पोक्रेट शपथ का प्रसंग छूट रहा है । वह भी देख लीज़िये कि किस सदी का आदर्श इस सदी में कितना प्रासंगिक रह गया है !

OATH OF HIPPOCRATES, Cerca 400 B.C.

From "Harvard Classics, Volume 38" Copyright 1910 by P.F. Collier and Son.

INTRODUCTORY NOTE

HIPPOCRATES, the celebrated Greek physician, was a contemporary of the historian
Herodotus. He was born in the island of Cos between 470 and 460 B.C., and belonged
to the family that claimed descent from the mythical Æsculapius, son of Apollo.
There was already a long medical tradition in Greece before his day, and this he is supposed
to have inherited chiefly through his predecessor Herodicus; and he enlarged his education
by extensive travel. He is said, though the evidence is unsatisfactory,
to have taken part in the efforts to check the great plague which devastated Athens
at the beginning of the Peloponnesian war. He died at Larissa between 380 and 360 B.C.

The works attributed to Hippocrates are the earliest extant Greek medical writings, but very
many of them are certainly not his. Some five or six, however, are generally granted to be genuine,
and among these is the famous "Oath." This interesting document shows that in his time physicians
were already organized into a corporation or guild, with regulations for the training of disciples, and
with an esprit de corps and a professional ideal which, with slight exceptions, can yet be regarded as out of date.

One saying occurring in the words of Hippocrates has achieved universal currency, though few who
quote it to-day are aware that it originally referred to the art of the physician.
It is the first of his "Aphorisms": "Life is short, and the Art long;
the occasion fleeting; experience fallacious, and judgment difficult.
The physician must not only be prepared to do what is right himself,
but also to make the patient, the attendants, and externals cooperate."

THE OATH OF HIPPOCRATES
I SWEAR by Apollo the physician and Æsculapius, and Health, and All-heal,
and all the gods and goddesses, that, according to my ability and judgment,

I will keep this Oath and this stipulation — to reckon him who taught me this
Art equally dear to me as my parents, to share my substance with him,
and relieve his necessities if required;
to look upon his offspring in the same footing as my own brothers,    ?
and to teach them this art,
if they shall wish to learn it, without fee or stipulation; and that by precept,
lecture, and every other mode of instruction,
 

I will impart a knowledge of the Art to my own sons, and those of my teachers,
and to disciples bound by a stipulation and oath according to the law of medicine,
but to none others.
I will follow that system of regimen which, according to my ability and judgement,
I consider for the benefit of my patients, and abstain from whatever is deleterious and mischievous.

I will give no deadly medicine to any one if asked, nor suggest any such counsel; and in
like manner I will not give to a woman a pessary to produce abortion. With purity and with
holiness I will pass my life and practice my Art.

I will not cut persons labouring under the stone, but will leave this to be done by men who are
practitioners of this work. Into whatever houses I enter, I will go into them for the benefit of the
sick, and will abstain from every voluntary act of mischief and corruption; and, further, from the
seduction of females or males, of freemen and slaves. Whatever, in connection with my professional
service, or not in connection with it, I see or hear, in the life of men, which ought not to be spoken of abroad,

I will not divulge, as reckoning that all such should be kept secret. While I continue to keep this Oath unviolated,
may it be granted to me to enjoy life and the practice of the art, respected by all men, in all times.
But should I trespass and violate this Oath, may the reverse be my lot.

मैं तो कई कई बार पढ़ चुका हूँ, मेरा मंतव्य अपने युगपुरुष की अवमानना करना नहीं है,    मैं तो कैपिटेशन और तमाम धाँधलियों के दौर में केवल इसमें की विसंगतियों को दिखाना चाहता हूँ । यह शपथ झकझकाते फ्रेम में जड़ा हुआ कई अस्पतालों में दृष्टिगोचर हो जायेगा वैसे ही जैसे अपने भारत महान के तमाम दफ़्तरों में हँसते हुए गाँधी बाबा के फोटो को साक्षी बना कर वारे न्यारे हो रहे हैं । सो शपथ की दुहाई देने पर मैंने अपनी टिप्पणी में यही कहा था

     " ......रही बात शपथ की, तो वह यह अब उतना ही प्रासंगिक रह गया है जितना कचहरी में खड़े होकर गीता पर हाथ रखना या संसद में शपथ लेना ।  "

अच्छा ! तो, अब तक का कहा सुना माफ़ करना जी !

चलो छुट्टी मिली

कोई भले ही सहमत न हों किंतु यह पोस्ट ख़ालिस स्वस्थ बहस की परपंरा में है ।

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एक बात तो रह ही गयी, थोड़ी व्यक्तिगत है ! बताऊँ? या न बताऊँ ? अच्छा बता ही देता हूँ ।  मैं कुछ दिलचस्प पोस्ट के लिंक अपने बेटे शान्तनु को भेज देता हूँ ताकि उसका हिंदी से नाता जुड़ा रहे और वह हिंदी पढ़ने का सुख ले सके । कोटा आरक्षण वगैरह के नाटक से क्षुब्ध सा होकर, काउंसलिंग से पहले ही समुद्र लाँघ गया । यानि कि वह विदेश में है, मेडिकल का फ़ाइनल वर्ष है ।  और मेडिकल यूनिवर्सिटी का ताज़ा ताज़ा ख़ुमार है, सो उसका ये कैसे डाक्टर पर मुझसे बार बार कुछ लिखने का आग्रह ज़ारी रहा करने लगा । अक्सर स्काईप पर बतियाने के दौरान याद दिलाने के भाव से घुमा फिरा कर पूछ ही लेता है कि आपकी ममता बुआ से लड़ाई फ़ाइनल हुई ? ( उसके घोर बाल्यावस्था में ही मेरी घुटी हुई पंडिताईन ने अपने बच्चों को यह ज्ञानप्राप्त करा दिया था कि उनको छोड़ बाकि सभी महिलाओं को बुआ ही कहा जाता है ! सो, बीयर इट डियर्स ) अब मेरी इस मज़बूरी को तो आपको समझना ही चाहिये , मैं बिल्कुल निर्दोष हूँ । ब्लगियाने की बुरी लत लगती जा रही है, यह अलग बात है ।

23 February, 2008

यह डाक्टर ?.. .. .. वाह रे डाक्टर !

क्रम - पाँच  * अब जरा इनसे भी मिल लें

बात डाक्टरों की चल रही हो और इनसे न मिलवाऊँ जरा अनुचित लगता है । आख़िर ऎसे दिग्गज तो आप के पास पड़ोस में ही दिख जायेंगे । ज़रूरत आपके नज़र दौड़ाने की है । डाक्टर ही डाक्टर...   एक बार मिल तो लें ! हर जाति, वर्ण और गोत्र के रोगों का शर्तिया एवं माक़ूल गारंटीशुदा इलाज़ यहाँ होता है ! निराश क्यों.. कमज़ोर क्यों रहते हो ? वगैरह !

कानून के आँख के नीचेइनका पलड़ा भारी रहेगा

सो इस श्रृंखला में इनका उल्लेख न करना नके साथ, प के साथ और पने व्यवसाय के साथ नाइंसाफ़ी होगीइनको महत्वहीन करार देकर कोई सरकार, कोई व्यवस्था या हमारा समाज अपने प्रति ईमानदार नहीं रह सकती । आख़िर कैसे यह पनप और फल फूल रहे हैं, कभी सोचा है ?  यदि नहीं तो शायद मैं  आपकी कुछ सहायता कर सकूँ । इनसे मिलिये, यह हैं.. .. ..

चेतावनियों के बावज़ूदडाक्टर कंधई साहब 

डाक्टर कंधई ! जी हाँ ख़वातीन हज़रात, यह हैं डाक्टर कंधई ! यह अनुभवसिद्ध बुज़ुर्गवार 1975 से चिकित्सारत और खासे धाकदार हैं । रायबरेली मुख्यालय से मात्र 20 किलोमीटर दूर सुल्तानपुर हाईवे पर बरामद होते हैं । क्वैक !  अज़ी बोलना भी नहीं, कुछेक धुँआयें हुये गंदले कागज़ काँच के फ़्रेम में अपने पुरातन होने की गवाही देते हुये दीवार पर सुशोभित हैं । कंधई कहते हैं, हम्मैं झोला छाप कहे  की केहिका हिम्मत है ? सामने आवै तौ बताई उनका कि हम कउन अहिं ! हम्मैं गावरमिन्ट लैसंस दिहे है , परताबगढ़ और मानिकपुर के मरीज़ कउनौ हमका निहारे नहिं आवत इहाँ ? अई लग्गै  कछु होई तबै तौ लोग अइहैं । सत्यवचन महाराज, इन महाशय को दिवंगत केन्द्रीय स्वास्थ्यमंत्री राजनारायण की दूरदर्शिता से एक टिन का  बक्सा और जनस्वास्थ्य रक्षक का रुक्का मिला था और गाँव ज़वार के लोगों की प्राथमिक चिकित्सा का उत्तरदायित्व ! तब लाखों लोग लग गये थे इसमें ! सरकारें आती जाती चीज़ हुआ करती है इनके लिये । यह अब तक डटे हैं और गरीब जनता को सःशुल्क लाभान्वित कर रहे हैं , स्वयं तो लाभान्वित हो ही रहे हैं साथ में इनके दो लड़के एक भतीजा और एक नाती भी लगा हुआ है ! पहुँच जाइये तो गज़ब नज़ारा मिलेगा । भिनभिनाते हुए मरीज़, बीड़ी की सुगंध बिखेरते डाक्टर कंधई ( बहुधा उनके पुराने मुँहलगे मरीज़ स्वयं ही बीड़ी सुलगा कर उनकी थकान देख उनकी ओर बढ़ा देते हैं ) काश, मेरे पास भी पांडेयजी के जैसा फोटू खींचने वाला मोबाइलफोन होता । खैर .. उनके यहाँ आपको नीचे फ़र्श से लेकर ऊपर दोछत्ती ( टाँड़ ) तक मरीज़ अपने अपने कथरी अंगोछे पर स्वास्थ्यलाभ करते मिल जायेंगे । लगभग सभी के सभी ग्लुकोज़ की बोतल के ज़रिये किसी अनाम हल्के पीले रंग की संजीवनी से सिंचित होते हुये, गिरती बूँदों पर टकटकी लगाये हुये दिखेंगे ।लगभग 70 - 80 मरीज़ों को यहाँ नित्य जीवनदान मिलता है । मर गये तो.. .. समय आय गवा रहै !

रोमन के A से लेकर Z तक जितने भी कांबिनेशन बन सकते हैं, ऎसी डिग्रियों से विभूषित हज़ारहाँ डाक्टर जहाँ तहाँ पुष्प पल्लवित हो रहे हैं । डिग्रियाँ ऎसी की आप अपने ज़नरल नालेज़ की पुस्तकों में ढ़ूँढ़ते रह जाओगे, मसलन L.L.M.F.( CG)  यानि लटक लटक कर मैट्रिक फ़ेल ( छत्तीसगढ़ )   अब इनसे जागरूक करने का उत्तरदायित्व किसका बनता है ? MCI एवं IMA ने माननीयों का ध्यान आकर्षित करने का बीड़ा उठाया । मौन प्रदर्शन भी किये गये और फिर हम मौन  हो गये । सुप्रीमकोर्ट ने ज़िम्मेदारी निभायी, आदेश पारित किया कि इनको चिन्हित किया जाय एवं आख्या प्रस्तुत की जाये । टिप्पणी भेजी गयी, प्रकरण संज्ञान में लिया गया, विवेचना ज़ारी है । उसकी बानगी भी जरा निगलते जाइये । तुग़लकी फ़रमान ज़ारी हुआ सभी सक्षम डिग्रीधारक पंजीकृत किये जायें एवं हरवर्ष नवीनीकरण अनिवार्य हो । पहली भर्ती के समय नवांकुरित IAS को मेडिकल के नाम पर डाक्टरों के सामने आदमज़ाद होकर पेश होना पड़ता होगा, ऎसे अपमान का बदला भला यही हो सकता है कि पहले हंसों के डैने तोड़ो, हाँका लगने पर कौव्वे तो स्वतः ही उड़ जायेंगे । हुँह.. शायद बचपन में यही देखा हो कि चावल के दाने बीन कर अलग कर देने के बाद कंकड़ों के छुपने की गुंज़ायश नहीं रहती । सो, यह क़वायद बाक़ायदा जारी है !

डाक्टर गाँव में नहीं रुकते, यह सच है । इससे इंकार करना बेईमानी होगी । जिनकी भी गाँवों के गँवई राजनीति की थोड़ी बहुत परख हो, वह शायद ऎसा न कहें । लम्बरदार, भूतपूर्व प्रधान, रसूख रखने वाले खेतिहर सबमें एक रस्साकसी चलती रहती है कि कौन डाक्टर को लपक कर अपने पास रख ले । यदि ये न चाहें तो भला गाँव में कौन चैन से टिक सकता है ? आख़िर ग्रामीण पृष्ठ्भूमि से निकल कर आये चिकित्सा स्नातक फिर क्यों नहीं लौटना चाहते उस माटी मॆं जहाँ उनकी जड़ें हैं । अपनी मिट्टी का सोंधापन किसको नहीं भाता ?  आख़िर कुछ तो है.. .. ..  जो कि,  अंग्रेज़ी में लिखना छोड़ छाड़ यह डाक्टर प्रातः 3.30 बजे बरहा से जूझ रहा है ! शुभ प्रभात !

21 February, 2008

ये डाक्टर .. .. .. वाह डाक्टर ?

क्रम - चार  * कुछ अनकहे बेज़ान सवालात

' उड़ि ज़हाज़ का पंछी पुनि ज़हाज़ पर आवे ', सो अंततोःगत्वा इधर को साहस बटोर कर लौट ही आना पड़ा । वैसे ही अपने हिंदी ब्लागजगत में टिप्पणियों का टोटा* पड़ा रहता है और कहीं कोई यही न टिप्पणिया बैठे , " अरे वाह डाक्टर , चोरी और सीनाज़ोरी ! "  मौके की नज़ाकत के लिहाज़ से कुछ दिनों की छुट्टी लेनी पड़ी और कुछ हल्के फ़ुल्के पोस्ट निट्ठल्लेपन में  ठेल कर अपनी ख़ारिश ख़ारिज़ करता रहा । इस अमितवा ने तो मुँह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ा , अब डाक्टरों पर क्या लिखूँ ?

बिरादरी की नाक-अमरघेरे में डाक्टरकंकाल पर टिका डाक्टर    अमित पकड़े तो गये किंतु कुछ सवाल भी खड़े कर रहे हैं , आखिर यहसब वह क्यों और कैसे करते रहे ? एक बार या दूसरी बार तो नहीं, उसके इस घृणित कृत्य की निर्द्वन्द बारंबारता क्या परिभाषित कर रही है ? इस बार भी पकड़े जाने पर उसका कांफ़िडेन्स ग़ज़ब का रहा । गिरफ़्त में आते ही बीस लाख की पेशकश, मीडिया कैमरों के सामने ' जस्ट टेक केयर एट दिस मोमेन्ट, आई विल मैनेज़ द अदर थिंग्स लैटर ' की तर्ज़ पर दिया गया स्माइल बोले तो  मुस्की हमें कौन सा संदेश दे रही है ?  तो, यह छोटा सा ब्रेक यहीं ख़त्म किया जाय ?  ठीक है । इतिः अमित प्रकरणः ॥

आर्यावर्ते जम्बूद्वीपे भारतखँडे छड्डयारडाटब्लागस्पाटेस्थितः कुछ तो है  गोत्रे क्रमांशितः ये डाक्टर .. ..  वो डाक्टर  मूलकथा पुनः आरंभ 

आपको कौतुक भले हो रहा हो, यहाँ तो कसमसाहट हो रही है । कसमसाहट शनैः शनैः दर्द का रूप लेगी, और जैसा कि सर्वविदित है दर्द के हद से गुज़र जाने के बाद ही दवा निकलेगी ! फिलहाल अपनी गौरमिन्टिया तो पब्लिक को उपभोक्ता संरक्षण का बायस्कोप दिखाय के बहलाय रही है ।

क्या करोगे डाक्टरये डाक्टर-तीनक्या करोगे डाक्टर-दो                 थोड़ाबहुत हमारी नज़र से आप भी देखो । आधारभूत सुविधायें न तो डाक्टर को दे रहे हो, अउर न जनता को , दोनों का धैर्य चुक रहा है । मानवसेवा के नाम पर डाक्टर ठगे जा चुके है, इनमें से कुछ तथाकथित समझदार अपने भारत महान का मोहत्याग कर बिल छोड़ छोड़ पलायन कर रहे हैं ।  भोलीभाली जनता भी पंचवर्षीय योजनाओं का पाँच का पहाड़ा रटते रटते नींद से जागने वाली है । जागेगी तो इससे पहले कि अपना हक माँगें, उसे उलझा दो । क्लाइव का फ़ारमूला चिरंजीव है । डाक्टर और पब्लिक आपस में उलझे रहें । सत्ता के धावक तो अपनी हर समिस्या  का डंडा एक दूसरे को थमाते हुये अपना रिले रेस जारी रहेंगे, और हम ?   हम एक दूसरे को गरियाने में व्यस्त रहेंगे !

ये डाक्टर-एकबेचारा ये डाक्टरये डाक्टर-दो                  अब इज़ाज़त हो तो जरा मैं भी ताल ठोक लूँ ! कोई बताये कि क्या अकेला एक डाक्टर ही मिला है... .. काहे का  उपभोक्ता अउर काहे का संरक्षण ? जब भौतिकवाद का बोलबाला है और डाक्टर मरीज़ के बीच पैसा है तो एक उपभोक्ता हुआ और दूसरा उपभोग्य । है ना यही बात ? एकदम वाज़िब है यह !

तो वकील साहब काहे इतराय घूम रहे हैं ? हमने तो मुकदमा जीतने की फ़ीस दी थी और हार गये । हमारे वकील साहब ने ऎसी क्या सेवा उपलब्ध करायी कि उनकी फ़िसिया ज़ायज़ है ? हमरे पिताजी को फाँसी चढ़वाय दिहै तो मुआवज़ा कौन भरेगा ?  जिसने उनको बचाने की फ़ीस ली थी, वही ना !

और हमारे मास्टर साहब ? साल भर फ़ीस भरा, दो महीने छुट्टी, तीन हफ़्ते हड़ताल । फिर भी फ़ीस साल भर की दे दिया, चलो कोई बात नहीं .. .. हड़ताल वड़ताल तो होता ही रहता है, बेचारे ! लेकिन हाय दैय्या, ई का ग़ज़ब ? इस साल भी सालाने में बच्चा फ़ेल ! बोले दिमाग ही नहीं है लौंडे के,  अग़र डाक्टर बोला मरीज़ में ज़ान नहीं बची थी तो बवाल ! विद्यादान करे की दुहाई मत दो,भाई । अब इहाँ गुरु-शिष्य की परंपरा बची ही कहाँ है , वह ज़माना तो है नहीं कि गुरुआनी के लिये जंगल से लकड़ी वकड़ी बीन कर लाओ , गुरुजी के पैर दबाओ और गुरुजी पढ़ा दें । अब तो हार्ड कैश लिया है तो फेल काहे किये हो हमरे छौना को ? इसीलिये न कि हमने आपकी कोचिंग में लड़के को नहीं भेजा ? फिर आप मास्टर साहब 44 तारीख़ को ज़िला अस्पताल में धरने पर क्यों बैठे थे, प्राइवेट प्रैक्टिस के ख़िलाफ़ ? ई कोचिंगवा भी तो प्राइवेट प्रैक्टिस है कि नहीं, बोलिये जरा ? हम्माम में तो सभी नंगे !

किसी सुविधा या कार्य के संपादन लिये अपनी अंटी से नाँवा ढीला किया और आप कंज़्यूमर हो गये । यह तो भाई हम भी मानते हैं । हाउसटैक्स, डेवलेपमेन्ट चार्ज़ेज़ वगैरह वगैरह समय पर वसूल लेते हो, और लोग यहाँ कचड़े कूड़े में साँस लेने को मज़बूर हैं । क्या करें भाई, साँस तो लेना ही पड़ेगा, प्राण थोड़े त्याग देंगे इन बेशरमों की लापरवाही के चलते ? अब भला यह कौन सा तर्क है कि आप वाटर टैक्स दे रहे हैं, मिल रहा है सीवर से रिसा हुआ पानी, चलिये बदबू न सही पर है असल में वाइरस और बैक्टीरिया का घोल । आपने प्यासे तो मरना नहीं है, उबाल निथार कर पीयोगे ।     लकी हो तो ठीक वरना बीमार हो कर डाक्टर के पास पहुँचोगे । डाक्टर बेचारा दस नियम अधिनियम से लदा हुआ आपका ईलाज़ कर ही देगा । डायग्नोसिस क्या बताये, ऊपर से खर्रा आया है कि रिपोर्टिंग नहीं करना वरना सस्पेंशन लेकिन अनआफ़िसीयली DM और CMO को बताओ ज़रूर ।

इन सब में कोई भी नज़ीर वांछित नहीं है , लोग बाज़ार में बैठ चिल्ला रहे हैं । चिल्लाओ और जोर से चिल्लाओ । क्या फ़र्क पड़ता है  जहाँ हर कोई बाज़ारू हो गया है । जिधर नज़र दौड़ाओ उधर ही थोड़ी बहुत वेश्यावृत्ति चल रही है । अरे हाँ, वेश्यावृत्ति पर मेरे दिमाग में बैठा शैतान गुनगुना रहा है कि जरा पूछो वेश्यावृत्ति भी उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में क्यों नहीं ? भाईलोगों ने पैसा लुटाया है, तबियत बहल